Maha Geeta Daily Capsule
The Ashtavakra Gita — Daily Wisdom
स्थितप्रज्ञ की वाणी
The Speech of the Established
Discourse 66 · Ch. 17 सच्चा ज्ञानी · The True Knower · Verses 17.10–17.12
Ashtavakra describes how the speech of the wise is different. Words still come — but no one is speaking through them to construct an identity. The voice arises from clarity, not strategy. Osho contrasts this with most human speech, which is half communication and half self-presentation. The wise have lost the second half.
अनुद्विग्नः सदा वक्ता क्व मूकः क्व च वाचालः।
anudvignaḥ sadā vaktā kva mūkaḥ kva ca vācālaḥ
The unagitated is always the true speaker — what is mute, what is talkative for one settled in self?
📖 Hindi Vocabulary
| Devanagari | Transliteration | Meaning |
|---|---|---|
| वाणी | vāṇī | Speech, voice |
| अनुद्विग्न | anudvigna | Unagitated |
| मौन-वाचालता | mauna-vācālatā | The wise speak from silence |
| स्वत:उद्भूत | svataḥ-udbhūta | Self-arising — like words |
| निरहंकारी | nirahaṃkārī | Without ego in voice |
Notice in one conversation today: am I speaking to communicate, or to construct? Both can be present. Just see, without judgment.
यह पॉडकास्ट स्थितप्रज्ञ की वाणी पर अष्टावक्र के शिक्षण को खोलता है। 'स्थितप्रज्ञ' भगवद्गीता का प्रसिद्ध शब्द है — 'स्थापित बुद्धि वाला।' अष्टावक्र इसका विस्तार करते हैं: स्थितप्रज्ञ की वाणी कैसी होती है? वह कब बोलता है, कब चुप रहता है, कैसे बोलता है? चर्चा करें कि भाषा अहं का सबसे सूक्ष्म साधन है — हम बोल कर अपनी पहचान गढ़ते हैं, अपनी भूमिका मज़बूत करते हैं, दूसरों पर प्रभाव डालते हैं। स्थितप्रज्ञ की वाणी इन सबसे मुक्त है। उन श्लोकों से गुज़रें जहाँ अष्टावक्र कहते हैं: 'अनुद्विग्नः सदा वक्ता' — कभी विचलित न होने वाला सदा बोलने वाला है। यह विरोधाभासी लगता है — एक तरफ़ अकंपन, दूसरी तरफ़ बोलना। ओशो स्पष्ट करते हैं: स्थितप्रज्ञ बोलता है पर वाणी से उसकी पहचान नहीं। शब्द आते हैं, उपयोगी होते हैं, चले जाते हैं — पर पीछे कोई बोलने वाला नहीं जो शब्दों से अपनी छवि बना रहा हो। बौद्ध 'सम्यक् वाक्' (सम्यक भाषा) से तुलना — पर अष्टावक्र की 'सम्यक' स्वाभाविक है, अनुशासन से नहीं उठती। ज़ेन गुरु लिनजी की प्रसिद्ध शिक्षा को लाएँ: 'जब तुम बोलते हो, सच बोलो। पर सच बोलने की कोशिश मत करो।' यह वही है। ओशो की उस गुरु की कथा सुनाएँ जो दिन भर चुप रहते थे और जब बोलते थे, हर शब्द हीरा था। शिष्य ने पूछा 'आप इतना सोच कर कैसे बोलते हैं?' गुरु ने कहा, 'मैं नहीं सोचता — शब्द आते हैं जैसे साँस आती है।' समापन: आज एक बातचीत में रुको और देखो — क्या मैं बोल रहा हूँ या मेरे माध्यम से कुछ बोल रहा है? यह देखना ही वाणी को हल्का करता है।